कांग्रेस को गहलोत-सचिन पायलट के नाम पर भरोसा, तो बीजेपी को पीएम मोदी के नाम पर बड़ी जीत की उम्मीद

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ 2019 के सबसे बड़े सियासी युद्ध की रणभेरी बज गई है। राजस्थान में मतदान दो चरणों में- 29 अप्रैल और 6  मई को होगा। इस चुनाव से राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की कई तरह की चिंताएं और उम्मीदें भी जुड़ी हैं। ज़ाहिर तौर पर अपने-अपने दलों का प्रमुख नेता होने की वजह से इन दोनों पर ही चुनाव में संगठन के बेहतर प्रदर्शन का दबाव है।

राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी मारवाड़ इलाके के जाट बहुल नागौर, बाड़मेर, जोधपुर, जालोर, पाली और सीकर जिलों में हनुमान बेनीवाल का अच्छा जनाधार माना जाता है। इस बेल्ट की कई सीटों पर जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। बेनीवाल के आने से बीजेपी को इस क्षेत्र की लोकसभा सीटों पर लाभ मिल सकता है। इसके अलावा हरियाणा, वेस्ट यूपी और पंजाब में भी बेनीवाल के जरिए बीजेपी जाट वोटों में सेंध लगा सकती है। पहले चर्चा थी कि बेनीवाल कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। केंद्रीय मंत्री नागौर से वर्तमान बीजेपी सांसद सीआर चौधरी का विरोध हो रहा था। ऐसे में बेनीवाल को इस सीट से उतारकर बीजेपी ने नया सियासी दांव खेला है। 

राजस्थान में लोकसभा की 25 सीटें हैं और पिछले लोकसभा चुनाव में ये सभी सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं। इससे पहले केवल एक बार ही सारी की सारी सीटें किसी एक पार्टी के खाते में गई और वह चुनाव था 1984 का। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में सभी सीटें कांग्रेस ने जीतीं। राज्य में एक बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी की सरकार बनने की ‘परंपरा’ रही है। उसका ही असर लोकसभा चुनाव पर दिखता है। राजस्थान में लोकसभा चुनावों के परिणामों को देखा जाए तो 2004 से ही ऐसा रुख देखने को मिला कि राज्य में जिस पार्टी की सरकार बनती है, लोकसभा चुनाव में उसी को ज्यादा सीटें मिलती हैं। जबकि आमतौर पर राज्य के विधानसभा चुनाव के करीब छह महीने बाद ही लोकसभा चुनाव होते हैं। राज्य में 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 120 और कांग्रेस को 58 सीटें मिलीं। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने 25 में से 21 सीटें बीजेपी की झोली में डाल दीं। चार सीटें कांग्रेस को मिलीं। 2008 के विधानसभा चुनाव में पासा पलट गया। कांग्रेस को 200 में 96 सीटें मिलीं और अशोक गहलोत ने सरकार बनाई, बीजेपी को 76 सीटें मिलीं। । बीएसपी के सारे विधायक कांग्रेस में शामिल होने से कांग्रेस को बहुमत मिल गया। इसके ठीक बाद 2009 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 20 तथा बीजेपी को चार सीटें मिलीं। एक सीट पर निर्दलीय किरोड़ीलाल मीणा चुने गए जो उस समय कांग्रेस के समर्थक थे।

2013 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत के साथ बीजेपी को 163 सीटें मिलीं और कांग्रेस सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई। लोकसभा चुनाव के परिणाम तो और भी चौंकाने वाले रहे जब 2014 में मोदी लहर के बीच राज्य के मतदाताओं ने सारी 25 सीटें बीजेपी को दे दीं। यह अलग बात है कि पिछले साल दो सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस जीत गई। पिछले दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य की 200 में से 100 सीटें मिली हैं। बीजेपी के पास 73 सीटें हैं। हालांकि दोनों पार्टियों को मिले वोटों में अंतर केवल लगभग आधे प्रतिशत का है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, पार्टी को उम्मीद है कि इस एंटी इंकम्बैंसी के बावजूद इतना अच्छा वोट पर्सेंटेज बीजेपी अपने लिए प्लस पॉइंट मान रही है। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है की दिसम्बर  2018 में मात्र आधे प्रतिशत (0.5%) अंतर को वह लोकसभा चुनाव में बढ़ने नहीं देगी और परंपरा को तोड़ते हुए इस बार अच्छा प्रदर्शन करेगी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद जयपुर में अपने पहले कार्यक्रम में इसकी उम्मीद भी जताई।

वही सूबे के राजनीतिकारों की मानें तो वसुंधरा और गहलोत दोनों ही नेताओं को संगठन के अलावा अपने-अपने उत्तराधिकारियों यानी अपने बेटों के राजनैतिक भविष्य की भी फ़िक्र सता रही है। वसुंधरा राजे सिंधिया के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां सीट से भाजपा के टिकट पर पिछले तीन बार से सांसद चुने जाते रहे हैं, लेकिन इस बार राह आसान नहीं है। इससे पहले राजे लगातार तीन बार इस सीट से सांसद रही थीं। वहीं माना जा रहा है कि इन लोकसभा चुनावों में अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत भी कांग्रेस के टिकट पर अपना सियासी सफ़र शुरु करने की उम्मीद में हैं । 

News With Chai की टीम ने राजस्थान के कई इलाकों में चुनाव विश्लेषकों और पत्रकारों से बात की और लगभग सभी का कहना है की इस बार बीजेपी 25 में से 20 -21 सीट जीतने की स्थिति में है क्यूंकि अब वसुंधरा के खिलाफ उस समय रही जनता की नाराज़गी अब दूर हो चुकी है। जाट और राजपूतों ने विधानसभा में कांग्रेस का काफी साथ दिया लेकिन अब मोदी को पीएम बनाने के लिए ये वापिस बीजेपी के पाले में आते दिख रहे हैं। आप सबको याद होगा जैसे दिसम्बर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में एक नारा खूब चला था कि “मोदी तुझसे बैर नही, पर वसुंधरा रानी तेरी खैर नही”, मतलब साफ था कि लोगों को पीएम मोदी से तो बेहद प्यार है, लेकिन उस समय की सीएम रही वसुंधरा से भरी नाराज़गी। इसलिए बीजेपी का इस बार ट्रेंड बदलके अछि सीटों पर जितने का सपना बेमानी नही लग रहा है, जमीनी सच्चाई भी यही है। 

हाँ, सचिन पायलट के डिप्टी सीएम बनने के बाद गुर्जर वोटर क्या कांग्रेस का रुख करेंगे या फिर पीएम मोदी के नाम पर बीजेपी को सपोर्ट, ये तो चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा।