मुस्लिम वोटों का बीजेपी के खिलाफ एकजुट होना पड सकता है बीजेपी को भारी

उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे मौसम तापमान बढ़ रहा है वैसे ही सियासी पारा भी तेज़ी से बढ़ रहा है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अकेले 80 लोकसभा सीट हैं और 2014  में 80 में से 73 सीट पर जीत के दम पर ही बीजेपी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। 2014  में बीजेपी को 71 , बीजेपी की सहयोगी अपना दल को 2 सीट, समाजवादी पार्टी को 5 और कांग्रेस को 2  सीटों पर संतोष करना पड़ा था तो बसपा का खाता ही नहीं खुल पाया था। 

हालांकि इस बार लोकसभा चुनाव में इन सीटों को बचा के रखना सत्तारूढ़ भाजपा के लिए थोड़ा चुनौतीपूर्ण नज़र आ रहा है, क्योंकि सपा-बसपा-आरएलडी (SP-BSP-RLD) गठबंधन कागज़ों पर तो वोट बैंक के हिसाब से मजबूत नज़र आ रहा है। लिहाजा माना जा रहा है की मुस्लिम-जाटव-यादव के साझा वोटबैंक से बीजेपी को निपटना होगा और ये आसान नहीं है, इसलिए बीजेपी ने फोकस एक बार फिर सवर्ण के साथ गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वोटर्स पर कर दिया है। इसके साथ ही हर एक सीट पर बेहद बारीकी के साथ माइक्रो मैनेजमेंट किया जा रहा है। 

माना जाता है की 2014 लोकसभा और 2017 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर्स सपा-बसपा में बंटने  का फायदा बीजेपी को मिला था और गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वोटर्स ने जबरदस्त खुलके बीजेपी का सपोर्ट किया था जिस वजह से बीजेपी को इतनी बड़ी जीत मिली। लेकिन इस बार  सपा-बसपा गठबंधन से मुस्लिम वोट एकजुट होने की सम्भावना है और लगभग हर सर्वे यही इशारा कर रहे हैं की बीजेपी को काफी नुक्सान उठाना पड सकता है। 

हालाँकि यूपी की कुछ सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों के मज़बूती से चुनाव लड़ने के कारण मुकाबला त्रिकोणीय हो रहा है जिससे सपा-बसपा में भी बेचैनी है।  वहीँ  भीम आर्मी के चन्द्रशेखर रावण के भी चुनाव मैदान में अलग से उतरने की ख़बरों से मायावती के कोर वोट बैंक जाटव वोट के बिखराव के डर ने भी मायावती की नींद उडा दी हैं। यही कारण  है की मायावती कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद रावण को लेकर हमलावर हैं। बसपा सुप्रीमों दलित-मुस्लिम वोटरों को लुभाने में लगी हैं तो उन्हें भीम आर्मी से खतरा भी नजर आ रहा है। दरअसल, बहुजन समाज पार्टी गठबंधन की 38 सीटों में से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 12 पर मैदान में उतरेंगी। इस इलाके में मुस्लिम और दलित खासतौर पर जाटव वोट जीत के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बहनजी को फिक्र सता रही है कि भीम आर्मी संस्थापक चंद्रशेखर की वजह से अगर दलित वोट में सेंध लगी तो मुस्लिम भी कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। इसी के मद्देनजर मायवती, न केवल कांग्रेस से दूरी बनाए रख रही है, बल्कि बसपा कैडर को सपा से मिलजुल कर प्रचार करने का फरमान दिया गया है, ताकि दलित-यादव गठजोड़ का मुस्लिमों पर संदेश जाए कि यह दोनों भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस की अपेक्षा बेहतर और मजबूत विकल्प हैं।

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अहमियत से हर कोई वाकिफ है. 2014  में यूपी के बल पर बीजेपी ने केन्द्र में सरकार बनाई थी। इस बार भी भाजपा यूपी को लेकर काफी उत्साहित है। बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह अबकी बार यूपी के लिए 74 पार का नारा दे रहे है, लेकिन आकड़ों पर गौर करें तो लगता नहीं है कि भाजपा 2014 का इतिहास दोहरा पाएगी। इस बार हालात काफी बदले हुए हैं। एक बार को यह मान भी लिया जाए कि मोदी सरकार को लेकर जनता में कोई खास नाराजगी नहीं है, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन भाजपा के लिए दलित-मुस्लिम और यादव बाहुल्य सीटों पर परेशानी का सबब बनती दिख रही हैं। भाजपा गठबंधन ने 2014 लोकसभा चुनाव में 80 सीटों में से जिन भाजपा 73 सीटों पर फतह हासिल की थीं उनमें 20 सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों की जीत का अंतर अधिकतम लाख-सवा लाख वोटों का था। इनमें भी भाजपा के करीब डेढ़ दर्जन उम्मीदवार एक लाख से कम मतों के अतंर से जीते थे।

उक्त सीटों पर 2014 में सपा-बसपा को मिले कुल वोट का हिसाब लगाया जाए तो भाजपा इस हिसाब में पिछड़ती नजर आती है। गोरखपुर, फूलपुर और कैराना संसदीय सीटों के उप-चुनाव में भी सपा व बसपा अपने-अपने वोट एक-दूसरे को दिला ले गई तो इन 20 सीटों पर भाजपा की जीत की राह कठिन होती दिखाई देती है। भाजपा के रणनीतिकार भी इस बात को समझ रहे है। इसीलिए इन सीटों के चुनावी समीकरण दुरूस्त करने की कोशिश शुरू हो गई है। 

गठबंधन का गणित बिगाड़ने के लिए भाजपा भी कम कोशिश नहीं कर रही है। केन्द्र की मोदी और यूपी की योगी सरकार अपनी-अपनी योजनाओं के लाभार्थियों को अपने वोटों में बदलने पर काम कर रहे हैं। पार्टी की तरफ से अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों को भाजपा के पक्ष में लामबंद करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। बात उन सीटें की कि जाए जो भाजपा के लिए हैं खतरे की घंटी साबित हो सकती है। उसमें सहारनपुर, नगीना, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, खीरी,कौशांबी आदि सीटें शामिल हैं। 

उधर, बसपा प्रमुख मायावती भी इस प्रयास में जुटी हैं कि मुस्लिम और दलित वोट बैंक उनके पाले से न खिसके। सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी मुस्लिमों समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह(सपा) ही भाजपा से टक्कर लेने की स्थिति में है। उत्तर प्रदेश में लगातार दौरे कर रहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी इसी कवायद में हैं कि कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक रहे मुस्लिमों और दलितों में पुरानी पैठ बनाई जाए।

2014  लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी अनुप्रिया पटेल के अपना दल को बीजेपी ने 2 सीट दी हैं. लेकिन ओमप्रकाश राजभर के सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के हवाबाज बयानों की वजह से अब तक उनके साथ लोकसभा में गठबंधन की स्थिति स्पष्ट नहीं है. विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा और स्थानीय छोटे दलों के बीच गठबंधन में सबसे चर्चित ओमप्रकाश राजभर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने के बावजूद विवादों के केंद्र में रहे। पिछले तीन वर्षों के कार्यकाल में राजभर और उनकी पार्टी ने अति पिछड़ों के आरक्षण और सत्ता में उनकी भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष पर कई बार अनदेखी और वादाखिलाफी के आरोप लगाए। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ पर भी राजनैतिक आरोप लगाए। इसीलिए भाजपा नेतृत्व ने उनके साथ सीटों के बंटवारे को लेकर अभी तक कोई निश्चित फैसला नहीं किया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष के साथ हुए समझौते पर भाजपा की टालमटोल के निहितार्थ यह हैं कि पार्टी इस बार उनकी अहमियत को उतनी तवज्जो देने के मूड में नहीं है। यही नहीं, राजभर के साथ तालमेल बना कर चलने वाली निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के साथ समझौता कर उसे अपने गठबंधन में शामिल कर भजपा ने अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है। ओमप्रकाश राजभर को काफी समय तक लटकाए रखने के साथ भाजपा ने अब यह स्थिति ला दी है कि राजभर के लिए किसी साथी-सहयोगी (अन्य पिछड़े वर्ग) से सार्थक गठबंधन की गुंजाइश न बची रहे। एक तरह से बीजेपी ने सुहेलदेव पार्टी की मांगो के आगे न झुकने का सन्देश दिया है. उधर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद (गोरखपुर सांसद) बीजेपी में शामिल हो गए हैं जिसे सपा-बसपा गठबंधन के लिए झटका माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में 7 चरणों में वोटिंग होनी है और पहला चरण 11 अप्रैल को पश्चिमी उत्तरप्रदेश की आठ सीटों पर मतदान से शुरू होगा।